Sunday, June 15, 2014
Jats history of Afganistan
अफगानिस्तान के पश्चिमि हिस्से मेँ खट्टर , खटकर,पंवार और अन्य गौत्र के जाट रहते है।
पर अफगानिस्तान बहुत पहले ही भारत से अलग हो गया था इसलिए उनकी तरफ ध्यान नहीँ दिया गया जबकि वे भी जाट इतिहास का एक हिस्सा है। अफगानिस्तान का ये हिस्सा कजाखिस्तान , उज्बेकिस्तान के करीब है।
यंहा गुज्जर भी रहते है पर वे भी अपने को एक जाट गोत्र या जाटोँ की एक शाखा ही मानते है। वैसे राजस्थान मेँ भी गूजर गौत्र के कुछ गांव है। इसलिए इस बात पर हैरानी नहीँ कि अफगानिस्तान मेँ भी गूजर गौत्र के जाट रहते हैँ।
रेगिस्तान होने के कारण यंहा के जाट ऊंट रखते है और ऊंटो से खेती करते है, कुछ विदेशी इतिहासकारोँ ने इन्हे कैमिल ड्राइवर, खानाबदोश ,जिप्सी तक नाम दिया।
और सिंध के जाट ऊंट नहीँ पालते थे जिसका हवाला इतिहासकारोँ ने दिया पर अफगानिस्तान का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारोँ ने शायद राजस्थान, और सिरसा के जाटोँ का अध्ययन नहीँ किया जो ऊंट पालते थे।
भारतीय जाट इतिहासकारोँ ने अफगानिस्तान के जाटोँ के बारे मेँ शायद इसलिए नहीँ लिखा कि वे मुस्लिम थे और अगर अध्ययन किया जाता तो सबसे ज्यादा जाट इस्लाम को मानने वाले सिद्ध हो जाते।
उज्बेकिस्तान के बाकू मेँ तो जाट(आर्य) लोगोँ की यज्ञशाला अबतक सुरक्षित है। इसलिए अगर हम अफगानिस्तान के जाटोँ का अध्ययन करे तो मुझे पक्का विश्वास है कि उक्त देशोँ मेँ भी जाट होने के प्रत्य्क्ष प्रमाण मिलेगेँ।
मैँ इंजिनियरिँग का छात्र हूं इसलिए इतिहास के लिए कम समय है पर मेरा जाट इतिहासकारोँ से निवेदन है कि वे अन्य देशोँ के जाटोँ का भी अध्ययन करेँ।
मुझे हाल मेँ ही एक मित्र ने बताया था कि चंगेज खान(johal jat gotra) भी जाट था जिसके गौत्र के जाट सिँध मेँ आज भी मिलते है। चंगेज खान से बड़ा साम्राज्य आज तक विश्व मेँ किसी का नहीँ रहा।
पर अफगानिस्तान बहुत पहले ही भारत से अलग हो गया था इसलिए उनकी तरफ ध्यान नहीँ दिया गया जबकि वे भी जाट इतिहास का एक हिस्सा है। अफगानिस्तान का ये हिस्सा कजाखिस्तान , उज्बेकिस्तान के करीब है।
यंहा गुज्जर भी रहते है पर वे भी अपने को एक जाट गोत्र या जाटोँ की एक शाखा ही मानते है। वैसे राजस्थान मेँ भी गूजर गौत्र के कुछ गांव है। इसलिए इस बात पर हैरानी नहीँ कि अफगानिस्तान मेँ भी गूजर गौत्र के जाट रहते हैँ।
रेगिस्तान होने के कारण यंहा के जाट ऊंट रखते है और ऊंटो से खेती करते है, कुछ विदेशी इतिहासकारोँ ने इन्हे कैमिल ड्राइवर, खानाबदोश ,जिप्सी तक नाम दिया।
और सिंध के जाट ऊंट नहीँ पालते थे जिसका हवाला इतिहासकारोँ ने दिया पर अफगानिस्तान का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारोँ ने शायद राजस्थान, और सिरसा के जाटोँ का अध्ययन नहीँ किया जो ऊंट पालते थे।
भारतीय जाट इतिहासकारोँ ने अफगानिस्तान के जाटोँ के बारे मेँ शायद इसलिए नहीँ लिखा कि वे मुस्लिम थे और अगर अध्ययन किया जाता तो सबसे ज्यादा जाट इस्लाम को मानने वाले सिद्ध हो जाते।
उज्बेकिस्तान के बाकू मेँ तो जाट(आर्य) लोगोँ की यज्ञशाला अबतक सुरक्षित है। इसलिए अगर हम अफगानिस्तान के जाटोँ का अध्ययन करे तो मुझे पक्का विश्वास है कि उक्त देशोँ मेँ भी जाट होने के प्रत्य्क्ष प्रमाण मिलेगेँ।
मैँ इंजिनियरिँग का छात्र हूं इसलिए इतिहास के लिए कम समय है पर मेरा जाट इतिहासकारोँ से निवेदन है कि वे अन्य देशोँ के जाटोँ का भी अध्ययन करेँ।
मुझे हाल मेँ ही एक मित्र ने बताया था कि चंगेज खान(johal jat gotra) भी जाट था जिसके गौत्र के जाट सिँध मेँ आज भी मिलते है। चंगेज खान से बड़ा साम्राज्य आज तक विश्व मेँ किसी का नहीँ रहा।
Why Jats of Khapland converted to Islam?
"जाट लोग औरंगजेब के डर से मुस्लिम बन गये"
ये बात गलत ही नहीँ बल्कि हास्याद्पद भी है। यह बात कहने वाले शायद ही इस बात का प्रमाण दे पायेँ।
.
पहली बात तो ये कि औरंगजेब के काल मेँ केवल अपर दोआब और हरयाणा यानि खापलैण्ड के जाट ही मुस्लिम बने।
और इसका सबसे बड़ा कारण रहा इस्लाम के नाम पर मिलने वाली सुख सुविधाएं।
जाट किसान थे और और इस्लाम के नाम पर मिलने वाली सुविधांए जैसे जागीरदारी, कर मेँ छूट, दरबार मेँ मिलने वाले शाही सम्मान आदि ने जाटोँ को प्रभावित किया।
ऐसी बात नहीँ है कि वे हिन्दु धर्म से पीडित थे या सम्मान नहीँ मिलता था। जाट यंहा के मालिक थे , वो जैसा चाहते थे वैसा होता था।
और औरंगजेब की इतनी हिम्मत नहीँ थी जो खाप के मामलोँ मेँ दखल दे सके। औरंगजेब के अत्याचारोँ की कहानी खापलैण्ड पर बिल्कुल फिट नहीँ हो सकती।
अगर औरंगजेब जाटोँ को जबरदस्ती मुस्लिम बनाने की कोशिश करता तो खाप पंचायते उसको दिल्ली से भगा देती या विरोध तो जरूर करती और एक भी जाट को मुस्लिम ना बनने देती।
कुछ ने सवा मण जनेऊ की थ्योरी गढ़ी, पर जाट जनेऊ नहीँ पहनते थे।
औरंगजेब के अत्याचार की थ्योरी खापलैँड पर बिल्कुल लागू नहीँ होती।
इस बात का प्रचार भाटोँ और जोगियोँ ने किया कि जाट डर कर मुस्लिम बन गये।
सत्य तो ये है कि जाट बहुत चतुर थे और वे धर्म को गहनता से नहीँ मानते थे, इसलिए इसमेँ कोई शक नहीँ कि उन्होने सुविधाऔँ का फायदा उठाने के लिए इस्लाम अपना लिया हो। और अन्य जाटोँ ने इसलिए इनका विरोध नहीँ किया , अगर अन्य जाट भाईयोँ को फायदा होता हो तो विरोध किस बात का??
जबरदस्ती वाली दलील समर्थ गुरु रामदास(दक्षिण का ब्राह्मण) और उसके चेले जोगियोँ ने शुरु की, उसने जाटोँ को धार्मिक कट्टर बनाने के लिए प्रयास किये, और धर्म परिवर्तन को गलत बताया।
इतिहासकार डा. गिरीश चंद्र द्विवेदी ने भी जबरदस्ति वाली बात को गलत माना और कहा कि जबरदस्ति से जाट का धर्म परिवर्तन असंभव है। अगर जबरदस्ती की जाती तो जाट का मुस्लिम बनना बिल्कुल असंभव था।
जाट कहीँ का भी हो पर उनमेँ कुछ गुण समान होते है जैसे विद्रोही स्वभाव, हठ यानी जिद्दीपन, अपने कानून मानना आदि।
कुछ विरोधियोँ ने भी इस कहावत को माना कि " बाल हठ तोड़ी जा सकती है पर जाट हठ नहीँ"।
ये बात गलत ही नहीँ बल्कि हास्याद्पद भी है। यह बात कहने वाले शायद ही इस बात का प्रमाण दे पायेँ।
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पहली बात तो ये कि औरंगजेब के काल मेँ केवल अपर दोआब और हरयाणा यानि खापलैण्ड के जाट ही मुस्लिम बने।
और इसका सबसे बड़ा कारण रहा इस्लाम के नाम पर मिलने वाली सुख सुविधाएं।
जाट किसान थे और और इस्लाम के नाम पर मिलने वाली सुविधांए जैसे जागीरदारी, कर मेँ छूट, दरबार मेँ मिलने वाले शाही सम्मान आदि ने जाटोँ को प्रभावित किया।
ऐसी बात नहीँ है कि वे हिन्दु धर्म से पीडित थे या सम्मान नहीँ मिलता था। जाट यंहा के मालिक थे , वो जैसा चाहते थे वैसा होता था।
और औरंगजेब की इतनी हिम्मत नहीँ थी जो खाप के मामलोँ मेँ दखल दे सके। औरंगजेब के अत्याचारोँ की कहानी खापलैण्ड पर बिल्कुल फिट नहीँ हो सकती।
अगर औरंगजेब जाटोँ को जबरदस्ती मुस्लिम बनाने की कोशिश करता तो खाप पंचायते उसको दिल्ली से भगा देती या विरोध तो जरूर करती और एक भी जाट को मुस्लिम ना बनने देती।
कुछ ने सवा मण जनेऊ की थ्योरी गढ़ी, पर जाट जनेऊ नहीँ पहनते थे।
औरंगजेब के अत्याचार की थ्योरी खापलैँड पर बिल्कुल लागू नहीँ होती।
इस बात का प्रचार भाटोँ और जोगियोँ ने किया कि जाट डर कर मुस्लिम बन गये।
सत्य तो ये है कि जाट बहुत चतुर थे और वे धर्म को गहनता से नहीँ मानते थे, इसलिए इसमेँ कोई शक नहीँ कि उन्होने सुविधाऔँ का फायदा उठाने के लिए इस्लाम अपना लिया हो। और अन्य जाटोँ ने इसलिए इनका विरोध नहीँ किया , अगर अन्य जाट भाईयोँ को फायदा होता हो तो विरोध किस बात का??
जबरदस्ती वाली दलील समर्थ गुरु रामदास(दक्षिण का ब्राह्मण) और उसके चेले जोगियोँ ने शुरु की, उसने जाटोँ को धार्मिक कट्टर बनाने के लिए प्रयास किये, और धर्म परिवर्तन को गलत बताया।
इतिहासकार डा. गिरीश चंद्र द्विवेदी ने भी जबरदस्ति वाली बात को गलत माना और कहा कि जबरदस्ति से जाट का धर्म परिवर्तन असंभव है। अगर जबरदस्ती की जाती तो जाट का मुस्लिम बनना बिल्कुल असंभव था।
जाट कहीँ का भी हो पर उनमेँ कुछ गुण समान होते है जैसे विद्रोही स्वभाव, हठ यानी जिद्दीपन, अपने कानून मानना आदि।
कुछ विरोधियोँ ने भी इस कहावत को माना कि " बाल हठ तोड़ी जा सकती है पर जाट हठ नहीँ"।
Titles of Jats/Jatts, Sardar/Singh/Kaur
खालसा
पंथ की स्थापना से पहले सरदार शब्द केवल जमीँदार जाटोँ के लिए इस्तेमाल
होता था, जो लड़ाके थे। पाकिस्तान के पंजाब मेँ भी कुछ मुस्लिम जाट भी अपने
नाम से पहले सरदार लगाते है।
सिख धर्म मेँ 70 % जाट ही है, वक्त के साथ साथ ये टाईटल खत्री आदि कौम भी प्रयोग करने लगी। और अब सरदार का मतलब बस सिख रह गया है जबकि ये जाटोँ का टाईटल था।
हिन्दी भाषी क्षेत्र के जाट लम्बरदार टाइटल का प्रयोग करते थे। जबकि चौधरी शब्द का प्रयोग पंजाब के जाट भी करते थे पर गांव के मुखिया के लिए चौधरी शब्द का प्रयोग किया जाता था।
सिँधी , फारसी मेँ भी सरदार लड़ाकू टुकड़ी के मुखिया के लिए प्रयोग किया जाता था।
सिख इतिहास मेँ भी सरदार शब्द जाट लड़ाकोँ के लिए आता है पर बाद मेँ सबके लिए इस्तेमाल किया गया।
पर धार्मिक अंधता ने पूरे इतिहास को तबाह कर दिया, जाटिज्म का विनाश करने की कोशिश की ।
अब कुछ लोग हिन्दुत्व की आड़ लेकर ये काम कर रहे है।
सिँह और कौर भी जाटोँ के लिए इस्तेमाल होते थे,बाघपत, शामली, मुजफ्फरनगर मेँ जाट औरते के नाम के बाद कौर होता था। पर गावोँ मेँ नाम छांट देते थे,जैसे शीतल कौर को शितलो , अतल कौर को अतलो ,प्रेम कौर को प्रेम्मो ,फूल कौर को फूल्लो आदि आदि नाम.. ..
सिख धर्म मेँ 70 % जाट ही है, वक्त के साथ साथ ये टाईटल खत्री आदि कौम भी प्रयोग करने लगी। और अब सरदार का मतलब बस सिख रह गया है जबकि ये जाटोँ का टाईटल था।
हिन्दी भाषी क्षेत्र के जाट लम्बरदार टाइटल का प्रयोग करते थे। जबकि चौधरी शब्द का प्रयोग पंजाब के जाट भी करते थे पर गांव के मुखिया के लिए चौधरी शब्द का प्रयोग किया जाता था।
सिँधी , फारसी मेँ भी सरदार लड़ाकू टुकड़ी के मुखिया के लिए प्रयोग किया जाता था।
सिख इतिहास मेँ भी सरदार शब्द जाट लड़ाकोँ के लिए आता है पर बाद मेँ सबके लिए इस्तेमाल किया गया।
पर धार्मिक अंधता ने पूरे इतिहास को तबाह कर दिया, जाटिज्म का विनाश करने की कोशिश की ।
अब कुछ लोग हिन्दुत्व की आड़ लेकर ये काम कर रहे है।
सिँह और कौर भी जाटोँ के लिए इस्तेमाल होते थे,बाघपत, शामली, मुजफ्फरनगर मेँ जाट औरते के नाम के बाद कौर होता था। पर गावोँ मेँ नाम छांट देते थे,जैसे शीतल कौर को शितलो , अतल कौर को अतलो ,प्रेम कौर को प्रेम्मो ,फूल कौर को फूल्लो आदि आदि नाम.. ..
कौर
शब्द भी कंवर शब्द का अपभ्रंस है, खाप इतिहास मेँ जाट औरते के नाम के बाद
कंवर , कौर मिलना आम बात है। पर गुरु गोबिँद सिँह जी ने हर खालसा को सिँह
और कौर टाइटल दे दिये।
Farmer anthem of jatland
हम मेहनतकश, जग
वालों से जब
अपना हिस्सा मांगेंगे
इक खेत नहीं इक देश
नहीं हम
सारी दुनिया मांगेंगे
याँ सागर सागर
मोती है याँ परबत
परबत हीरे हैं
ये सारा मॉल
हमारा है हम
सारा खजाना मांगेंगे
जो खून बाह जो बाग़
उजड़े जो गीत
दिलों में कत्ल हुए
हर कतरे का हर गुंचे
का हर गीत
का बदला मांगेंगे
ये सेठ
व्यापारी रजवाड़े
दस लाख तो हम दस
लाख करोड़
ये कितने दिन
अमेरिका से जीने
का सहारा मांगेंगे
जब सफ़
सीधी हो जायेगी जब
सब झगडे मिट जायेंगे
हम हर इक देश के झंडे
पर इक लाल
सितारा मांगेंगे।
.
Faiz Ahamad Faiz(a great jat writer)
वालों से जब
अपना हिस्सा मांगेंगे
इक खेत नहीं इक देश
नहीं हम
सारी दुनिया मांगेंगे
याँ सागर सागर
मोती है याँ परबत
परबत हीरे हैं
ये सारा मॉल
हमारा है हम
सारा खजाना मांगेंगे
जो खून बाह जो बाग़
उजड़े जो गीत
दिलों में कत्ल हुए
हर कतरे का हर गुंचे
का हर गीत
का बदला मांगेंगे
ये सेठ
व्यापारी रजवाड़े
दस लाख तो हम दस
लाख करोड़
ये कितने दिन
अमेरिका से जीने
का सहारा मांगेंगे
जब सफ़
सीधी हो जायेगी जब
सब झगडे मिट जायेंगे
हम हर इक देश के झंडे
पर इक लाल
सितारा मांगेंगे।
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Faiz Ahamad Faiz(a great jat writer)
Jats/Jatts relation with prophet Nooh/Noah
जाट जाति लगभग 2000 साल से भी ज्यादा पुरानी है।
ऑल्ड टेस्टामेँट, बाईबिल और कुराण मेँ पैगम्बर नूह (Nooh, noah) के बारे मेँ लिखा होना भी इस बात का एक प्रमाण है। प्रोफेट नूह ईसा मसीह से पहले धरती पर आये थे, यानि 2000 साल से पहले लगभग 500 से 800 ईसा पूर्व।
प्रोफेट नूह के तीन लड़के थे जो जाट थे। और इन तीनोँ के नाम के गौत्र ईरान और सिँध के जाटोँ मेँ पाये जाते है।
पैगम्बर नूह का जिक्र कुराण के 28 वेँ और 71 वेँ सुरा मेँ भी मिलता है।
विश्व के सभी इतिहासकार पैगम्बर नूह के तीनोँ लड़कोँ को जाट मानते हैं।
हालांकि अन्य धर्म ग्रंथोँ की तरह ही मैँ इन बातोँ पर विश्वास नहीँ करता कि कोई प्रोफेट नूह धरती पर आया होगा और उसके तीनोँ लड़के जाट थे।
पर जब लगभग 2500 साल पुरानी किताब मेँ जाटोँ का जिक्र आता है तो धरती पर जाट नाम की कोई चीज तो जरूर होगी। जो आज के इजरायल तक फैली होगी।
अन्यथा ऑल्ड टेस्टामेँट लिखने वाले को क्या पता होगा कि जाट भी कुछ है धरती पर।
अरबोँ ने तो जाटोँ के बारे मेँ सुना भी होगा पर यहूदियोँ को कैसे पता चला कि जाट है धरती पर। जरूर वे जाटोँ से मिले होगे या जाटोँ के बारे मेँ सुना होगा
ऑल्ड टेस्टामेँट, बाईबिल और कुराण मेँ पैगम्बर नूह (Nooh, noah) के बारे मेँ लिखा होना भी इस बात का एक प्रमाण है। प्रोफेट नूह ईसा मसीह से पहले धरती पर आये थे, यानि 2000 साल से पहले लगभग 500 से 800 ईसा पूर्व।
प्रोफेट नूह के तीन लड़के थे जो जाट थे। और इन तीनोँ के नाम के गौत्र ईरान और सिँध के जाटोँ मेँ पाये जाते है।
पैगम्बर नूह का जिक्र कुराण के 28 वेँ और 71 वेँ सुरा मेँ भी मिलता है।
विश्व के सभी इतिहासकार पैगम्बर नूह के तीनोँ लड़कोँ को जाट मानते हैं।
हालांकि अन्य धर्म ग्रंथोँ की तरह ही मैँ इन बातोँ पर विश्वास नहीँ करता कि कोई प्रोफेट नूह धरती पर आया होगा और उसके तीनोँ लड़के जाट थे।
पर जब लगभग 2500 साल पुरानी किताब मेँ जाटोँ का जिक्र आता है तो धरती पर जाट नाम की कोई चीज तो जरूर होगी। जो आज के इजरायल तक फैली होगी।
अन्यथा ऑल्ड टेस्टामेँट लिखने वाले को क्या पता होगा कि जाट भी कुछ है धरती पर।
अरबोँ ने तो जाटोँ के बारे मेँ सुना भी होगा पर यहूदियोँ को कैसे पता चला कि जाट है धरती पर। जरूर वे जाटोँ से मिले होगे या जाटोँ के बारे मेँ सुना होगा
Friday, April 18, 2014
जाटड़ा और काटड़ा, अपने को ही मारे इसी को तो कहते हैं:
जाटड़ा और काटड़ा, अपने को ही मारे इसी को तो कहते हैं:
अजीत सिंह ने बहुत बड़ी गलती की जो जाट आरक्षण के लिये अपना राजनैतिक भविष्य दाँव पर लगा दिया, अजीत सिंह को चहिये था कि जब मुजफरनगर मे दंगे हुये थे तो जाटो की हिमायत करके पश्चिमी उत्तर प्रदेश को दंगों की आग मे झोक देते, उस आग को और भड़कवाते, जाट बिरादरी का विनाश करवाकर अपनी राजनीति चमकाते, क्योंकि जाट ठहरे भावनाओं के गुलाम, वो बाद में अजीत सिंह से यह थोड़े ही पूछते कि तूने हमें दंगों की आग में झुकवाया अब हमारे घायलों का इलाज करवा, या उनका पुनर्वास करवा, या उनके उजड़े-जले हुए घरों को दोबारा बनवा; नहीं पूछते ना जब अमित-शाह और नरेंद्र मोदी, बीजेपी और आरएसएस, हिन्दू और हिंदुत्व वालों से नहीं पूछा, तो ये आप से भी नहीं पूछते|
और अब देखो अजीत सिंह, जाट आरक्षण दिलाकर क्या मिला आपको; जाटो की गालियाँ? और वही जाट युवा आपके खिलाफ हुआ खड़ा है| विभिन्न जाट-खापों और आरक्षण संघर्ष समितियों के प्रयासों को अमली जामा पहनाते हुए आपने आरक्षण दिलवाया और आपके ही दिए आरक्षण से इनको बढ़िया दाखिले मिलेंगे, नौकरियां मिलेंगी, नौकरियों में प्रमोशन मिलेंगे; लेकिन इनको उससे क्या?
अजीत सिंह आप आज के जाट युवा की रग नहीं पहचान पाये, आज के जाट युवा को तो दंगे चाहिए थे| फिर भले ही आप सबको मरवा-कटवा के उनको संभालने भी ना जाते; मोदी की आगरा रैली में इनके किसी भी चौधरी व् नेता को हॉनर करवाने की बजाये किसी भी संगीत-सोम टाइप को हॉनर करवा देते| इलेक्शन के टाइम एक अमित शाह आप भी छोड़ देते इनके बीच, जो इनको वीरांगनाओं सी बातें करके लुभाता (अरे बावलो अमित-शाह तो बनिया हो गया, जाट की शय में आ के तो भगवान भी वीरों जैसी बातें करने लग जाए; हमारे आज के जाट युवा को तो यही समझ नहीं आता कि तुम चीज क्या हो)|
मुलायम सिंह चाहता था कि मुजफरनगर दंगों मे एक बार अजीत सिंह जाटो की तरफ से बोल पड़े जिससे जाटो को मरवाने की भूमिका तैयार हो जाये। और आज जिस अजीत सिंह को इस तरह से घिरवाया जा रहा है कि अजीत सिंह ने जाटों को साथ नहीं दिया; कल इसी अजीत सिंह पे तोहमत लगवा दी जाती कि देखो अजित सिंह ने कितने जाट मरवा दिए मुज़फ्फरनगर में| और यह भोले जाट जो आज आपको इस बल कोस रहे हैं, कल उस बल कोसते| मतलब इन्होनें आपको कोसना फिर भी था, क्यों; क्योंकि जाटड़ा और काटड़ा अपने को ही जो मारता है| दूसरे तो फिर भले ही इनकी ऊर्जा-शक्ति-बल का जितना चाहे अपहरण करते रहें|
जाट युवाओं का भविष्य उज्जवल बनवाने का क्या सिला मिला अजीत सिंह आपको, ज़रा सोचियेगा? इनको उज्जवल भविष्य चाहिए था या इनको भड़का के इनके घर उजड़वाने वाले अमित-शाह जैसे गुर्गे? इस बार तो "गंजे (जाट-युवा) अपने सर खुजाने पे लगे हुए हैं, बस लहू निकाल के छोड़ेंगे अपने सर में"| कोई बात नहीं अगली बार आप भी कोई अमित शाह जैसा गुर्गा छोड़ देना इनके बीच, बैठे-बिठाए सारा काम हो जायेगा|
पगड़ी संभाल जट्टा, दुश्मन पहचान जट्टा| -
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